वर्तमान पीढ़ी की कड़वी सच्चाई पर आधारित एक कविता : देश बन रहा है विदेश
देश बन रहा है विदेश
संस्कारों को भूल गए, भूल गए अपना वेश ।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विदेश।।
मां-बाप बोझ लागे ,पराए लगते अपने।
परिजनों की दुआ बिना ,नहीं पूर्ण होंगे सपने।।
इनके चरणों में ही स्वर्ग है ,मत करना आवेश।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विदेश।।1।।
यार दोस्त अच्छे लगते ,परिवार को भुला रहे।
घर में है दौलत की किल्लत ,महफिल जमा रहे।।
इज्जत मिट गई खानदान की, बिक गए वेश।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विदेश।।2।।
मौज मस्ती के चक्कर में, सामाजिकता भूल गए।
आधुनिकता की होड़ में ,रीति-रिवाज बदल गए।।
तकनीक की दुनिया में, बदल रहा परिवेश।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विदेश।।3।।
परिवार को भुला दिया, खिड़कियों से झाँकते।
औलाद को पोषण नहीं, बार-बार डांटते ।।
आज फिर पी कर आए, घर में होगी क्लेश।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विद
परिवार की शिक्षा ली ही नहीं, चले गए कॉलेज।
लक्ष्य से तुम भटक गए, शिक्षा से होने लगा परहेज।।
पढ़ाई का खर्चा भी बेकार गया, किससे करें निवेश।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विदेश।।5।।
धोखाधड़ी से साख गंवाई, झूठ से विश्वास।
इमानदारी छोड़ दी, भ्रष्टाचार से आस।।
सहनशीलता सहन नहीं फर्ज गया परदेश ।
वक्त है समझने का,देश बन रहा है विदेश।।6।।
संस्कारों को भूल गए, भूल गए अपना वेश।
वक्त है समझने का, देश बन रहा है विदेश।।
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